यूनानी चिकित्सा - एक परिचय

बुकरात

यूनानी चिकित्सा पद्वति, जैसा कि इस के नाम से ही विदित है, अपने उद्भव के लिये यूनान के प्रति ऋणी है। यह यूनानी दार्शनिक-चिकित्सक बुकरात (हिप्पोक्रेटीज़) (460-377 ई0पू0) ही था जिसने चिकित्सा को अंधविश्वास और जादू टोने की सीमा से निकाल कर उसे विज्ञान की प्रतिष्ठा प्रदान की। यूनानी चिकित्सा पद्वति की सैद्वान्तिक संरचना बुकरात की शिक्षाओं पर आधारित है। बुकरत के बाद अनंेक अन्य यूनानी विद्वानों ने भी इस पद्वति का काफी संवर्धन किया। इस सब में जालिनूस (गेलन) (131-210 ई0) को एक महात्वपूर्ण स्थान प्राप्त है कि उसने इस पद्वति के आधार को सुदृढ़ बनाया

 

इब्नसीना

बुकरात पद्धति के आधार पर राजी (850-925 ई0) और इब्नसीना (980-1037 ई0) ने एक शानदार इमारत का निमार्ण किया। भारत मे यूनानी चिकित्सा अरबो के द्वारा पहुंची और शीध्र ही भारत की धरती में इसकी जडे़ मज़बूत हो गई। देहली सल्तनत, खिलजी एवं तुग़लक सुल्तानों और मु़गल बादशाहो ने उन विद्वानो को राजकीय संरक्षण दिया और उनमें से कुछ विद्वानों और चिकित्सकों को राजकीय कर्मचारियों और दरबारी चिकित्सकों में नामांकित किया। आम जनता को इस प्रणाली से तत्काल समर्थन प्राप्त हुआ और शीध्र ही पूरे देश में इसका प्रसार हो गया। ब्रिटिश शासन काल के दौरान यूनानी चिकित्सा को धक्का पहुंचा और उसका विकास राजकीय संरक्षण के आभाव में बाधित हुआ। परन्तु चूंकि इस पद्वति को सर्वसाधारण का विश्वास प्राप्त था, यह पद्वति प्रचलित रही।

 

हकीम अजमल खां

यूनानी चिकित्सा के एक विख्यात विद्वान और चिकित्सक हकीम अजमल खाॅ दिल्ली (1868-1927) भारत मे इस विधि के अग्रणी समर्थक थे। भारत के अन्य प्रान्तों में भी यूनानी चिकित्सा के ख्याति प्राप्त विद्ववान हुये है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हकीम अब्दुल अजीज साहब (1855-1911) तथा हकीम अब्दुल हमीद साहब आदि यूनानी चिकित्सा पद्वति के विख्यात विद्वान थें। भारत की आजादी के बाद यूनानी चिकित्सा पद्वति को भारतीय चिकित्सा पद्वति के रूप मे मान्यता दी गई और इसके विकास और प्रचार-प्रसार के लिये प्रयास किये गए।